गुरु दत्त की महान रचना प्यासा
प्यासे को पानी की दरकार नहीं है वोह तो अपनी मंज़िल ढूंढ रहा है. जब तक उसे खुद की ज़िन्दगी का मकसद नहीं मिल जाता तब तक वो एक भटकते खानाबदोश की तरह है जो अपना सपनो का घर ढूंढ रहा है. यह रास्ता विजय ने ने खुद चुना है. पता है उसे इस रस्ते पर कांटे है मगर उसे यह भी पता है कांटो के आगे ही गुलाब का फूल उसे मिलेगा।
प्यासा फिल्म नहीं है यह एक शायर की दुखती रग है. समाज ने उसे कोसा है सताया है मगर खमबख़्त शायर ऐसे ही होते है , ज़िद्दी पागल सरफिरे थैला लटाकए हुए जिसकी छोटी सी पोटली में उसकी दुनिया है. साला यह राइटर नाम की प्रजाति होती ही ऐसी ही ,खुद से बेखबर दुनिया से बेखबर लिखते रहते है पता नहीं क्या लिखते रहते है ,बस लिखते रहते है इसी में उनका सुकून है।
प्यासा में विजय का किरदार सीधे दिल को छू जाता है क्योकि इसमें दर्द है.
साहिर लुधियानवी के बोल,रफ़ी साहब की आवाज़,S .d बर्मन की मधुर संगीत , गुरु दत्त साहब का संजीदा अभिनय आपको एक एक शायर के दर्द से रूबरू करवाते है.
प्यासा फिल्म नहीं है यह एक शायर की दुखती रग है. समाज ने उसे कोसा है सताया है मगर खमबख़्त शायर ऐसे ही होते है , ज़िद्दी पागल सरफिरे थैला लटाकए हुए जिसकी छोटी सी पोटली में उसकी दुनिया है. साला यह राइटर नाम की प्रजाति होती ही ऐसी ही ,खुद से बेखबर दुनिया से बेखबर लिखते रहते है पता नहीं क्या लिखते रहते है ,बस लिखते रहते है इसी में उनका सुकून है।
प्यासा में विजय का किरदार सीधे दिल को छू जाता है क्योकि इसमें दर्द है.
जब हम चले तो साये भी अपना ना साथ दे ,जब तुम चलो तो ज़मीन चले आसमाँ चले , जब हम रुके तो साथ रुके शम-ऐ-बेकशी , जब तुम रुको बहार रुके चांदनी रुके। .प्यासा 2005 में १०० best films catagory में चुनी गयी थी. इतना ही नहीं अभी हाल में इस फिल्म की स्क्रीनिंग मुंबई में हुई थी वहा यह खूब सराही गयी.60 साल बाद भी इस फिल्म में वही जादू है जो उस वक़्त था.
साहिर लुधियानवी के बोल,रफ़ी साहब की आवाज़,S .d बर्मन की मधुर संगीत , गुरु दत्त साहब का संजीदा अभिनय आपको एक एक शायर के दर्द से रूबरू करवाते है.


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