यह ज़रा अजीब सी बात हो जायेगी की मैं एक फ्रेंच फिल्म को अंग्रेजी
सबटाइटल्स के साथ देख कर उसका हिंदी में विश्लेषण (so called REview)
करूँगा। मगर में ऐसा नहीं करूँगा क्योकि मैं क्या किसी फिल्म का विश्लेषण
करूँगा जिस फिल्म की संस्कृति ,भाषा ,उसकी ज़मीन को मैने कभी जीया ही नहीं।
मगर एक फिल्म enthusiastic person होने के नाते मुझे लगा की मुझे इस फिल्म के बारे में बात करनी चाहिए.
मुझे लगा मुझे बात करनी चाहिए वर्ल्ड सिनेमा के बारे में. विश्व सिनेमा से जब आप जुड़ते है तो आप इसे हॉलीवुड , बॉलीवुड, ब्रिटिश सिनेमा या यूँ कहे की आप इसे बड़े स्तर के सिनेमा से अगल रखते है. जहाँ हमे कई सारे देशो की अलग अलग संस्कृतियों से रूबरू करवाया जाता है। चाहे है वो ईरानियन सिनेमा हो या फिर फ्रेंच सिनेमा या इटेलियन सिनेमा इन्होने अलग पहचान बनायीं है वर्ल्ड सिनेमा में। ..
विश्व सिनेमा देखते वक़्त आप यह उम्मीद रखते हो यह फिल्म मेरी जैसी हो , मेरी संस्कृति से कैसे जुड़ती है,आप कुछ एक ऐसा जुड़ाव ढूंढते रहते हो जिससे आप उस फिल्म से जुड़ सको. The 400 blows देखते वक़्त मैं यही जुड़ाव खोज रहा था और मुझे वो जुड़ाव फिल्म में शुरूआती दृश्यों में दिख गया जब कक्षा में बैठे छात्र मास्टर के ब्लैक बोर्ड की ओर मुड़ते ही उसके पीठ पीछे शरारत करने लगते है, कैसे हमारे हाथो की गति इम्तेहान के आखिरी क्षणों में बढ़ जाती है ,कैसे हम कक्षा से तड़ीपार (bunk ) हो जाते थे।
यही सिनेमा देखने का मजा है जहा आप बिलकुल अलग संस्कृति में भी एक समानता ढूंढने लगते है जैसे की फिल्म एक दृश्य में दो पोलिसवाले लूडो खेल रहे होते है तब आपको महसूस होता है की भले ही संस्कृति अलग हो , भले ही भाषा , रहन-सहन अलग हो मगर हर जगह लोग एक जैसे होते है उनके इमोशन एक जैसे होते है।
फिल्म में Jean-Pierre Léaud का संजीदा अभिनय आपको एक हरामी बालक के चरित्र से भली भाति पहचान करवाता है. François Truffaut ने 1959 में इस फिल्म से अपनी जर्नी की शुरुआत की थी तब इस फिल्म को खूब सराहना मिली थी , कान फेस्टिवल में बेस्ट डायरेक्टर का पुरूस्कार भी मिला , अकीरा कुरोसोवा जैसे निर्देशकों की पसंदीदा फिल्म भी बनी ,बाकि इसके बारे में बहुत कुछ लिखा है इंटरनेट पर !!
अकीरा कुरोसोवा ,माइकल हनेके , माजिद मजीदी , असग़र फरहदी को देखने वालो मैं यही कहूंगा की ज़रा फ्रांकोइस ट्रूफॉट को भी समझो !!
(Pardon for any mistake in article)
मगर एक फिल्म enthusiastic person होने के नाते मुझे लगा की मुझे इस फिल्म के बारे में बात करनी चाहिए.
मुझे लगा मुझे बात करनी चाहिए वर्ल्ड सिनेमा के बारे में. विश्व सिनेमा से जब आप जुड़ते है तो आप इसे हॉलीवुड , बॉलीवुड, ब्रिटिश सिनेमा या यूँ कहे की आप इसे बड़े स्तर के सिनेमा से अगल रखते है. जहाँ हमे कई सारे देशो की अलग अलग संस्कृतियों से रूबरू करवाया जाता है। चाहे है वो ईरानियन सिनेमा हो या फिर फ्रेंच सिनेमा या इटेलियन सिनेमा इन्होने अलग पहचान बनायीं है वर्ल्ड सिनेमा में। ..
विश्व सिनेमा देखते वक़्त आप यह उम्मीद रखते हो यह फिल्म मेरी जैसी हो , मेरी संस्कृति से कैसे जुड़ती है,आप कुछ एक ऐसा जुड़ाव ढूंढते रहते हो जिससे आप उस फिल्म से जुड़ सको. The 400 blows देखते वक़्त मैं यही जुड़ाव खोज रहा था और मुझे वो जुड़ाव फिल्म में शुरूआती दृश्यों में दिख गया जब कक्षा में बैठे छात्र मास्टर के ब्लैक बोर्ड की ओर मुड़ते ही उसके पीठ पीछे शरारत करने लगते है, कैसे हमारे हाथो की गति इम्तेहान के आखिरी क्षणों में बढ़ जाती है ,कैसे हम कक्षा से तड़ीपार (bunk ) हो जाते थे।
यही सिनेमा देखने का मजा है जहा आप बिलकुल अलग संस्कृति में भी एक समानता ढूंढने लगते है जैसे की फिल्म एक दृश्य में दो पोलिसवाले लूडो खेल रहे होते है तब आपको महसूस होता है की भले ही संस्कृति अलग हो , भले ही भाषा , रहन-सहन अलग हो मगर हर जगह लोग एक जैसे होते है उनके इमोशन एक जैसे होते है।
फिल्म में Jean-Pierre Léaud का संजीदा अभिनय आपको एक हरामी बालक के चरित्र से भली भाति पहचान करवाता है. François Truffaut ने 1959 में इस फिल्म से अपनी जर्नी की शुरुआत की थी तब इस फिल्म को खूब सराहना मिली थी , कान फेस्टिवल में बेस्ट डायरेक्टर का पुरूस्कार भी मिला , अकीरा कुरोसोवा जैसे निर्देशकों की पसंदीदा फिल्म भी बनी ,बाकि इसके बारे में बहुत कुछ लिखा है इंटरनेट पर !!
अकीरा कुरोसोवा ,माइकल हनेके , माजिद मजीदी , असग़र फरहदी को देखने वालो मैं यही कहूंगा की ज़रा फ्रांकोइस ट्रूफॉट को भी समझो !!
(Pardon for any mistake in article)


0 Comments: