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हमारे देश के कई अलग शहरों में कुछ नौजवां लोग खुद को फिल्म डायरेक्टर बनने का सपना बनाये हुए हुए है , मगर हम जैसे गरीबो की किस्मत कहा कि हम किसी फिल्म स्कूल में जाकर ज्ञान हासिल कर सके.इस दुःख की घडी में एक ही साथी था जो हमारा हाथ थामे हुए था वो था  टोरेंट . और वो भी चला गया. टोरेंट वही जगह है जहाँ अनुराग कश्यप का सिनेमा पनपा ,जहा बैंडिट क्वीन और राकेट सिंह को सम्मान मिला, जहा बाइसिकल थीफ को वर्ल्ड से जुड़ने का सहारा मिला , जहा हम जैसे बन्दों ने जाना की बॉलीवुड और हॉलीवुड के अलावा भी कई और  सिनेमा है .
भारत में लोगो की आमदनी इतनी नही है कि हर फिल्म की bluray खरीद सके ,जिसकी मिनिमम रेट 500रुपया होती है ,और रही बात फिल्म के टीवी पर आने की वहां तो साउथ की फिल्मों का जमावड़ा है और जहा बॉलीवुड फिल्मे दिखाई जाती है वहां सूर्यवंशम और हैप्पी न्यू ईयर जैसी फिल्मों ने कब्ज़ा कर रखा है .
2006 में जब टोरेंट चालू हुआ तो यह सीडी बेचने वालों के लिए प्रधान मंत्री की किसी सहायक योजना की तरह हो गया. सालो ने खूब डाउनलोड कर करके हमको 20-20 रूपये में बेचीं है.
पिछले वर्ष जब मोदीजी की एक मात्र उपलब्धि जियो आया तो टोरेंट से फिल्म डाउनलोड करने वालो की संख्या में भारी हिजाफा हुआ.
मगर लगता है अब यह टोरेंट क्रांति का समापन हो रहा है , उम्मीद तो यही है कि मेरे करण अर्जुन की तरह टोरेंट बाबू भी जल्दी ही वापस आ जाएगा तब तक जुगाड़ते रहो यहाँ से वहाँ फिल्मे और मिले तो मुझे भी देना .

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